सीएम नीतीश सरकार का ऑर्गनाईज्ड क्रा!ई!म

सीएम नीतीश सरकार का ऑर्गनाईज्ड क्रा!ई!म


करोड़ों दबा कर हाईकोर्ट के आदेश को ताक पर रखना फिर लोक अदालत के फैसले को भी घण्टा बजा देना बिहार सरकार की बस मनमौजी है। यह सरकार आपकी हमारी कभी रही ही नही! सीएम नीतीश का जेब कभी भरता नही। नीतीश कुमार की नीयत और नीति यही रही है। कुर्सी की सुगंध में कुर्सी कुमार मताये हुए हैं। क्या कीजियेगा यह कुर्सी की सुगंध ही ऐसी है! नीतीश जी के लिये ऑक्सीजन से ज्यादा कुर्सी की सुगंध जरूरी है। Organized crime of CM Nitish government! एकदम वेल्ड प्लान के साथ ऑर्गनाईज्ड खेल है! जो 2011 से चल रहा है।

मामला 106 लेक्चरर और प्रोफेसर लोगों का

दरअसल इन सारे लेक्चरर और प्रोफेसर का वेतन और पेंशन की राशि हाई कोर्ट और लोक अदालत के आदेश बाद भी रोक कर रखी गई है। सरकार व राज्यपाल को बार-बार रिमाईंडर देने के बाद भी कोई सुनवाई नही। मई 2011 से इनलोगों का वेतन और पेंशन बन्द कर के रखा गया है। एमएलसी केदार पांडे जी ने सदन में कई बार यह मुद्दा उठाया जवाब में सरकार का दो टूक जवाब रहता फ़ाईल बढ़ रही है।

अब किस गति से फ़ाईल आगे बढ़ रही है नीतीश जी को जवाब देना चाहिए? आखिर कोर्ट के आदेश के बाद भी यह नकचढ़ी सरकार उन पैसों को क्यों दबा कर बैठी है? कोर्ट के आदेश को यह सरकार अपनी जागीर मान बैठी है।

इन 106 प्रोफेसर में से कुछ रिटायर्ड हो गए और कुछ दुनिया से ही रिटायर्ड हो गए। 106 लोगों की मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है पिछले 10 सालों से। कितने प्रोफेशर अपने हक के पैसों का इन्तेजार करते हुए स्वर्ग भी सिधार गए। यह क्राईम नही तो और क्या है!

जितने भी 106 लोगों का वेतन रुका हुआ है 1982 ई. और उससे पहले के नियुक्त लोग हैं। कमिटी ने इनलोगों को बहाल किया। यूनवर्सिटी ने अप्रूवल दिया और सरकार 2011-12 तक वेतन आदि देने लगी। फिर ऐसा हुआ कि 1982 ई. फरवरी और मार्च के बाद का एक सर्कुलर आया कि जो लोग कमीशन से रिकोमेंडेड नही हैं उनको वेतन नही दिया जाएगा। पेंच फंसाया गया! मंशा सरकार कि पैसों के बंदरबांट की रही होगी!

बहरहाल मामला कोर्ट में गया और लम्बा चला। फैसला 106 लोगों के पक्ष में गया। सरकार को आदेश दिया गया कि इनलोगों के वेतन आदि का भुगतान किया जाए। किंतु आदेश के बाद भी कोई सुनवाई नही है। सरकार व राजपाल को रिमाईंडर देने पर भी कान पर जूं तक नही।

लोक अदालत ने भी भुगतान कर देने को कहा पर बिहार के राजा बाबू नीतीश जी टोर्च जला कर देख रहे हैं कि मोमबत्ती बुझा है या जल रहा है। सफेद कपड़ों में यह काली करतूत नही तो और क्या है! जेब में कलम खोंस लेने से कुछ होता नही। कलम चलाना पड़ता है। पर यह सरकार कलम के बजाए लाठी डंडा चलाने में विश्वास रखती है।

Organized crime of CM Nitish government की क्रमवार जानकारी कुछ इस तरह है

1. कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत वि वि के अंतर्गत विभिन्न संबद्ध कॉलेजों के 106 प्राध्यापकों के वेतन मई, 2011 से बंद हैं।
2. ये अध्यापक 1982 से पूर्व स्वीकृत पद पर संबंधित कॉलेजों के शासी निकाय के द्वारा विधिवत नियुक्त हैं। इन्हें वि वि से अबाध रूप से वर्ष 2011, मई तक वेतन भुगतान होता रहा।
3. बिहार लोक सेवा आयोग और विश्वविद्यालय सेवा आयोग भंग होने तथा अन्य कारणों से इनकी सेवा संपुष्ट(confirm) नहीं हो सकी, जिसके कारण इनका वेतन अवरुद्ध हो गया।
4. आर्थिक तंगी, सामाजिक अपमान तथा बीमारी में चिकित्सा के अभाव के कारण अनेक प्राध्यापक दिवंगत हो गए, अनेक लोग सेवानिवृत हो गए और शेष लोग अब भी कार्यरत हैं।
5. राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में ऐसी ही समस्या है। इसे ध्यान में रखते हुए बिहार सरकार ने University act में संशोधन करते हुए विश्वविद्यालयों को selection committee का गठन कर इनके माध्यम से प्रभावित प्राध्यापकों की सेवा संपुष्ट करने का निर्देश जारी किया।
6. कामेश्वर सिंह संस्कृत वि वि ने selection committee का गठन किया और अपनी अनुशंसा दी। संबंधित कॉलेजों के शासी निकाय ने उसे विश्वविद्यालय को भेजा। विश्वविद्यालय के सिंडीकेट ने उसे पारित करते हुए उसे सरकार को समर्पित किया और संबंधित प्राध्यापकों को सेवा संपुष्टि का पत्र भी निर्गत किया।
7. किन्तु सरकार की ओर से अबतक कोई समाधान नहीं मिला।
8. इस बीच बकुलहर तथा मझौलिया के तीन प्राध्यापकों ने वेतन भुगतान के लिए पटना हाईकोर्ट गए। हाईकोर्ट ने मामले को लोक अदालत को सौंपा। लोक अदालत ने award के आधार पर सरकार और वि वि को 90 दिनों के भीतर वेतन भुगतान को कहा। किंतु इसका भी कोई निदान नहीं निकला। समस्या यथावत है।

मुंह में बकार नही इतना खाने के बाद डकार नही

आखिर कबतक पैसे को दबाए रखेगी सरकार। मुंह में दांत और पेट में आंत जब ठीक ढंग से काम कर रहा हो तो पाचन क्रिया तेज काम करता ही है। सरकार का पाचन तंत्र इतना मजबूत है कि पचाने में मिनटों नही लगता अरबों खरबों पचा लेना तो इस सरकार का बाएं हाथ का खेल है।

सरकार से अपने हक की मांग करो तो सरकारी डंडा तैयार है। इसे ही कहते हैं स्मार्ट तरीके से ऑर्गनाईज्ड क्रा!ई!म करना। न्यायालय ने तो अपना काम कर दिया पर यह नशे में धुत्त सरकार बड़े-बड़े बैनर पोस्टर पर चेहरा चमकाने और “जनता की सरकार” का नारा देने में व्यस्त है।

इस सरकार का दिमाग डायमंड पॉकेट बुक्स के चाचा चौधरी से भी तेज चलता है। इनके कैबिनेट में साबू से लेकर सुपर कमांडो ध्रुव तक मौजूद हैं। लेकिन अब इनका दांव यहां भी पंचर हो गया है।

106 लोगों को कोर्ट द्वारा आदेश मिलने के बाद भी सरकार अपनी करतूत से बाज नही आ रही। फ़ाईल दाब कर बैठी है। 2011 से फ़ाईल को इस टेबल से उस टेबल झूला झुलाया जा रहा है। शराब का नशा तो फिर भी उतर जाता है लेकिन सत्ता का नशा नाश कर देता है यह सीएम नीतीश को नही भूलना चाहिए। काउंट डाउन सरकार की शरू है।

ट्रैक से तो बाहर हो ही चुके हैं। अब बस रिटायर्ड हो कर किसी आश्रम में जाना रह गया है। अंदर ही अंदर दीमक की तरह बिहार को खाये जा रहे हैं। अगर लाज शर्म बची हो तो कोर्ट के फैसला पर अमल कीजिये। बिहार सम्भल नही रहा और पीएम बनने की जोर आजमाईश करने में लगे हैं। बहाना और बरगलाना छोड़िये। दूसरों का हक मार कर न्याय और नीति की बात करना शर्म की बात है।

अदालत ने तो अपना फैसला सुना ही दिया कबतक फ़ाईल दबा रहेगा। आखिर मंशा क्या है! क्यों नही वेतन पेंशन का भुगतान किया जा रहा। क्यों 2011 से फ़ाईल आगे नही बढ़ रहा? क्यों इतने गबरघाग बने हुए हैं? करोड़ों रुपये कहां गए? उन प्रोफ़ेसर और लेक्चरर के द्वारा फिर से आवेदन डाला गया है। फिर पहले की तरह एक बार कोर्ट फटकार लगाएगी। कबतक मुंह नीतीश सरकार मुंह छुपाएगी। सरकार को जवाब देना तो बनाता है। कितनी बार अपनी मिट्टी पलीद हो चुकी है। पब्लिक डोमेन में भी मामला उठ रहा है। हिसाब तो देना ही होगा!

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