दिल्ली प्रदूषण : विकास के नाम पर विनाश की गाथा

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आज जब सुबह अखबार पर नजर पड़ी तो दिल्ली एनसीआर की तीन करोड़ आबादी वाले खबर पर पड़ी। पढ़ने पर लगा दिल्ली की सांस रुक-रुक कर चल रही है। यहां सड़कों पर इंसान कम वाहन ज्यादा दिखते हैं। यहां की हवा में जहर घुल गया है। दिल्ली के आस पास के क्षेत्र भी अब इस प्रदूषण के जड़ में धंसता जा रहा है। मैंने अपने मित्र को फोन लगाया और दिल्ली की हालचाल पूछी। उसे इन सब बातों से कोई मतलब नही था।

वह बात मेट्रो की, मल्टीप्लेक्स की, मॉल की कार्ट पर बिकने वाली स्वादिष्ट डिश की ज्यादातर बातें कर रहा था। मैंने सीरियसली पूछा तो उसने बताया सुबह उठना फिर काम पर जाने के लिए आपाधापी दिन भर कामों में उलझा रहना रात 8 बजे तक घर लौटना फिर टीवी पर चिपक जाना यही जिंदगी है। सुबह कब होती है और रात कब बीत जाती है खबर नही रहती।

अब करीबी शहरों की बात कौन करे जब दिल्ली में ही जगह-जगह चल रही ग्रामीण सेवा के नाम पर ओवर लोडेड  वाहन, मेट्रो स्टेशन आने जाने के लिए आठ-दस सवारी लादे धुंआ छोड़ते ऑटो, पुराने आड़े तिरछे झुका कर स्कूटर की भरमार लोग सरपट दौड़ाए जा रहे हैं।

कई तरह से जुगाड़ कर बनाई गई वाहन भी हवा में जहरीली हवा तील तील कर मारने का काम कर रही है। समझना होगा कि गाड़ी कोई भी हो सीएजी से चले या फिर डीजल या पेट्रोल से, अगर उसमें क्षमता से ज्यादा भार होगा तो उससे निकलने वाला धुआं जानलेवा ही होगा।

आखिर विकास का पैमाना क्या है। कैसे तय होगा और कौन तय करेगा? बढ़ रही आबादी और उसके जरूरत के अनुसार विकास जैसे पानी, बिजली, मेट्रो, वाहन मतलब हर काम में लगी, लगने वाली पैसा के साथ ऊर्जा दिल्ली को बीमार करती जा रही है। पैटकॉन का नाम सबने सुना होगा अगर नही तो जान लीजिए इसे हर व्यक्ति को जानना चाहिए।

पैटकॉन पेट्रो पदार्थों को रिफायनरी में शोधित करते समय सबसे अंतिम उत्पाद होता है। इसे जलाने पर सबसे ज्यादा कार्बन उतपन्न होता है। बहुत सस्ता होने के कारण अधिकांश कल कारखाने के भट्टियों में इसी का प्रयोग होता है। जितना वाहन धुंआ उगलता है उससे दुगुना कल कारखाने से निकलने वाले कार्बन इसी पेट्रो से न्कलता है जो हवा में घुलता है। जो हवा को जहरीला बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आज दिल्ली राजधानी में ऐलान किया गया कि अगली सूचना तक स्कूलों बंद रहेंगे, लोगों से घर से काम करने का आग्रह किया गया है और वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तरों के कारण गैर-जरूरी ट्रकों को भारतीय राजधानी में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। भारत के शासक दिल्ली में ही बैठते हैं। संसद से सदन तक कि सारी नीति यहीं से बनती है। लेकिन नेताओं के वादे हर बार की तरह धाराशाही हो जाते है। कोई ठोस नीति नही बन पाती।

महज स्कूल कॉलेज ऑफिस को बंद कर क्या इस समस्या से निजात पाया जा सकता है? पार्यावरण दिवस मनाना बस उसी दिन के लिए होता है कि हम मिट्टी जल पेड़ पौधों से कितनी मुहब्बत करते हैं। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक और करीब 20 मिलियन लोगों का घर, दिल्ली हर सर्दियों में धुंध की मोटी चादर में लिपटी रहती है। दिल्ली इतनी प्रदूषित क्यों है?

जवाब स्मॉग की तरह ही स्तरित हैं। एक समस्या भूगोल है।  समतल, उपजाऊ मैदान जहाँ दिल्ली बैठती है, हिमालय से घिरा है, जो हवा की गति को अवरुद्ध करता है।  गर्मियों में, तीव्र गर्मी एक अपड्राफ्ट बनाती है, जो स्मॉग को ऊंचाई तक उठाती है जहां हिंद महासागर से मानसूनी हवाएं इसे बड़े पैमाने पर फैला सकती हैं।

कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों, श्मशान, कारखानों और भट्टियों के हवाई अपशिष्ट सस्ते में जल रहे हैं  पेट कोक और फर्नेस ऑयल, निम्न श्रेणी के ईंधन पर चलने वाले लाखों खराब ट्यून वाले वाहन, डीजल से चलने वाले लोकोमोटिव और जनरेटर, और गाय के गोबर और लकड़ी से चलने वाले खाना पकाने के चूल्हे। ये सारी चीजें जिम्मेवार हैं। प्रदूषण के कारकों की पहचान तो है पर सिर्फ चिंता करने से समस्या का समाधान नही होने वाला।

कंक्रीट के जंगल हम तैयार कर रहे हैं पर प्राकृतिक चीजों से दूर होते जा रहे हैं। जल जमीन जंगल पर हम आज काम ना करें तो यह प्रदूषण हमें लील लेगा। नीति बनाने वालों को ठोस और कड़े कदम उठाने होंगे। नेतागिरी चमकाने से इतर नेताओं मंत्रियों को सजगता से राह आसान बनाना होगा वरना दिल्ली ही नहीं देश जहरीली चैम्बर कब बन जाए पता तक नही चलेगा और तबतक देर हो चुकी होगी।

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