मोरबी हादसा: गॉड एक्ट नहीं फ्रॉड एक्ट है!

मोरबी हादसा: गॉड एक्ट नहीं फ्रॉड एक्ट है!

प्रधानमंत्री मोदी ने 2016 में पश्चिम बंगाल में हुई एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा था की यह दैविक कृत्य इस मायने में है कि यह हादसा चुनाव के मौजूदा वक्त पर हुआ है। जिससे लोगों को यह मालुम चल सके कि उन पर किस तरह की सरकार शासन कर रही है। यह शब्द ममता बनर्जी के सरकार के लिए कहा था। दरअसल 2016 में पश्चिम बंगाल में चुनाव होना था उसी दौरान पश्चिम बंगाल में एक निर्माणाधीन फ्लाई ओवर गिर गया।

हालांकि पुल के ऊपर कोई नही था और एक दिन पहले ही पुल की गर्डर डाली गई थी जो ढह गई और पुल के नीचे 42 लोग दब गये और उनकी मौत हो गयी थी। मोदी ने चुनावी रैली में “बेनिफिट” लेने के इरादे से कहा कि यह दैविक कृत्य इस मायने में है कि यह हादसा चुनाव के ऐन वक्त पर हुआ है, ताकि लोगों को यह पता चल सके कि उन पर किस तरह की सरकार शासन कर रही है।

ईश्वर का यह मैसेज है कि आज यह पुल गिरा है, कल वे पूरे बंगाल को समाप्त कर देंगी। आपके लिए ईश्वर का संदेश बंगाल को बचाना है। वहीं आज गुजरात के गृह मंत्री हर्ष संघवी ने मोरबी पुल हादसे पर कहा है कि इस मामले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

अब बताईये भला राजनीति हिन्दू, मुस्लिम, मंदिर, मस्जिद पर सिर्फ होनी चाहिए क्या! और क्या राजनीति करने का अधिकार सिर्फ एक ही पार्टी को है। यह भी बता दें कि किस चीज पर राजनीति हो बेरोजगारी, स्वास्थ्य और शिक्षा पर बात हो नही सकती. महंगाई की बात करो तो वह भी राजनीति गोले के अंदर आ जाता है।

आईये समझते हैं पुल की मनोदशा जो ढह कर भ्रष्टाचार की कहानी चीख चीख कर कह रहा है। मोरबी सस्पेंसन ब्रिज का रख रखाव मेंटेनन्स का जिम्मा ओरेवा ग्रुप की कम्पनी पर था। जो अब जांच के दायरे में आ चुका है। सबसे बड़ी बात मेंटेनेस के नाम पर यह पुल कई महीनों से बंद था। मेंटेनेस पर 2 करोड़ खर्च भी हुए।

तो सवाल उठाना लाजमी है की आखिर मेंटेनेस में किया क्या गया? 2 करोड़ रकम इतनी छोटी भी नही होती। बहरहाल मेंटेनेस के बाद पुल जनता के लिए फिर से खोल दिया गया था। पुल के खुले पांच दिन हुए थे और पुल ढह गया जिसमें 141 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। हादसे के बाद गुजरात पुलिस ने मरम्मत करने वाली एजेंसी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज तो कर ली पर उन लोगों का क्या जो अपनी जान गंवा चुके हैं।

पुलिस ने इस मामले में 9 लोगों को गिरफ्तार भी किया है। जिसमें चार ओरेवा ग्रुप के लिए काम करते थें। मामला यहां तक ही सिमित नही है मोरबी नगरपालिका और ओरेवा के बीच जो अनुबंध थें उसमें भी कई गलतियां सामने आई हैं।

2037 तक के लिए नगरपालिका और ओरेवा कम्पनी के बीच करार था 15 साल के लिए यह अनुबंध बना। अनुबंध में लिखा है की पुल के रख रखाव या प्रशासनिक कार्यों में सरकार या राज्य के एजेंसियों का कोई हस्तक्षेप नही होगा। अब एक एंगल से यह भी समझ लीजिये कि जिस तरह देश के सरकारी संपत्ति का निजीकरण हो रहा है यह घटना सबक के साथ यह भी सोंचने पर मजबूर कर रही है की निजीकरण के फायदे कम नुक्सान ज्यादा हैं।

भ्रष्टाचार का नंगा नाच शुरू यहीं से होता है। जब सरकार के हाथ में कुछ नही तो फिर प्राईवेट कम्पनियां मनमर्जी करेंगे। बहरहाल उसके बाद एक दुसरा खेल शुरू होता है ओरेवा कम्पनी के द्वारा देवप्रकाश सोल्युशन नामक एक कम्पनी को उपठेका दे दिया जाता है।

वहीं जब 2001 में भूकम्प में पुल क्षतिग्रस्त हुआ था उसमें भी वेदप्रकाश सोल्यूशन ही जिम्मेवार था। फिर आखिर इस कम्पनी को उपठेका क्यों दिया गया यह भी बड़ा प्रश्न है। लेकिन यहीं से चीजें धुंधली हो जाती हैं।

नगर पालिका के मुख्य अधिकारी संदीप सिंह जाला ने कहा कि उन्हें निजी ठेकेदार से कोई नवीनीकरण विवरण नहीं मिला, ताकि गुणवत्ता जांच जा सके। वैसे पुल के खुलने से पहले फिटनेस प्रमाण पत्र जारी किया जा सकता था। कितना गैर जिम्मेदाराना हरकत है इससे बात क्लियर हो जाती है।

ओरेवा ने 5 मार्च को अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे और 8-12 महीनों में पुल का मेंटेनेस किया जाना था, लेकिन 25 अक्टूबर को जनता के लिए पुल को खोल दिया। ओरेवा कम्पनी ने कहा कि टिकट की कीमत वयस्क के लिए 15 रुपये होगी और 2022-23 में 12 साल से कम उम्र के बच्चे के लिए यह टिकट दर 10 रुपये होगी।

फिर इसे अगले छह वर्षों के लिए प्रति वर्ष 2 रुपये बढ़ाया जा सकता है। चार्ज की गई कीमतों में भी विसंगति थी। वहीं रविवार को बेचे गए टिकटों की कीमत वयस्क के लिए 17 रुपये और बच्चे के लिए 12 रुपये थी।

ओरेवा ग्रुप के चेयरमैन जयसुख पटेल ने पुल को फिर से खोलते हुए कहा था कि अगर लोग जिम्मेदारी से इसका इस्तेमाल करते हैं तो पुल आसानी से अगले 15 साल तक खड़ा रहेगा। जयसुख पटेल को वह जिम्मेवारी भी जनता को बतानी चाहिए थी की कौन सी जिम्मेवारी होनी चाहिए।

लोगों को जागरूक करने के लिए कैम्पेन प्रचार तंत्र का इस्तेमाल कर लेते। यह भी ना हो सका। बेतुके जवाब देकर इस हादसे से उबरा नही जा सकता। यह गॉड ऑफ़ एक्ट नहीं बल्कि फ्रॉड ऑफ़ एक्ट है।

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