नीतीश सरकार ने भुलाया : उपेक्षित हैं आधुनिक बिहार के निर्माता सच्चिदानंद

नीतीश सरकार ने भुलाया : क्यों उपेक्षित हैं आधुनिक बिहार के निर्माता सच्चिदानंद यह शीर्षक देना इसलिए जरुरी लगा ताकि, लोगों के साथ मैं भी समझ सकूं की सच्चिदानंद की बिहार में क्या भूमिका रही। बिहार के गर्भ से कई विभूतियों का जन्म हुआ। उन्हीं में से एक हैं सच्चिदानंद सिन्हा। सिन्हा साहब के नाम से  मशहूर सच्चिदानंद सिन्हा का जन्म 10 नवम्बर को 1871 ई. को बिहार के मौजूदा बक्सर जिले के कोरान सराय के पास मोरार गाँव में हुआ था।

कल सारा सोशल साईट खंगाला शायद उनके जन्म दिवस पर सरकार या हम बिहारियों द्वारा कुछ आयोजन हुआ होगा। लेकिन जेपी आन्दोलन के कोख से जन्में बिहार के मुख्यमंत्री आत्मबोध के चक्कर में उप-मुख्यमंत्री यानी अपने भतीजे के जन्मदिवस पर (9 नवम्बर 2022) एक आयोजन पर मंच शयेर करते हुए गले लगाते हुए हैप्पी बर्थ डे की बधाई देते रहे।

आखिर क्यों नीतीश सरकार ने भुलाया : क्यों उपेक्षित हैं आधुनिक बिहार के निर्माता सच्चिदानंद

सबों से सीएम नीतीश ने हाथ उठा कर अपने कार्यकर्ता को भी बोलने को कहा कि हाथ उठा कर हैप्पी बर्थ डे बोलिए। कार्यकर्ता बेचारे करते भी क्या आदेश का पालन करना ही था। ठीक उसके अगले दिन सच्चितानंद सिन्हा का भी जन्म दिवस (10 नवम्बर) था। अख़बार तक खंगाल डाला की कहीं किसी कोने में जन्म विशेष पर खबर छपी हो। लेकिन जिसे दफन कर दिया गया हो और जिनके अस्तित्व को भुला देने की साजिश रची जा रही हो।

उसे किसी खबर के पन्ने में जगह नही मिलती। कल तक वही तेजस्वी जो सीएम नीतीश को कूट पिस कर कोसा करते थें आज सीएम नीतीश के साथ गलबहियां कर रहे हैं। बहरहाल राजनीति के अपने मन मिजाज और नियम कायदे होते हैं जो उसूलों से बढ़ कर हो जाते हैं! खैर! सोशल साईट खंगाला पर सच्चिदानंद सिन्हा के जन्म विशेष पर कुछ नही मिला। आज अखबार तक में नहीं।

मिलता भी कैसे नीतीश की आत्ममुग्धा बिहार को रसातल तक जो ले जा रही है। बिहार की विभूतियों को इतिहास के पन्नों से मिटाने का काम साजिश के तहत बड़ी चतुराई के साथ किया जा रहा है। जब सवाल उठता है कि क्या सच्चिदानंद सिन्हा का नाम आपने सुना है तो यह प्रश्न आज के युवा पीढ़ी के लिए यक्ष प्रश्न होता है। उनके मानस पटल पर बॉलीवुड, क्रिकेट जैसे ‘विभूतियों’ पर आ कर टिक जाती हैं।

यह कौन नया सेलिब्रिटी !

युवा अपने मन को टटोलते होंगे की आखिर यह कौन नया सेलिब्रिटी है जो छुट रहा है और जिसे मैं नहीं जानता! जब उन्हें बताया जाता है कि यह वही सच्चिदानन्द सिन्हा हैं जिन्होंने बिहार को अलग प्रान्त बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई और सामाजिक स्तर पर बिहार में नवजागरण का सूत्रपात किया। तो यह सुनते ही युवा बगल झांकते हुए दांत निकाल देते हैं मानों जैसे कोई चुटकुला सूना दिया गया हो।

दोष उनका नही हमारा है। सच्चितानंद जैसे विभूतियों को सरकार के द्वारा उपेक्षा मिलना राजनीति लाभ हानि पर टिका रह जाता है। बहरहाल सच्चिदानंद के प्रयासों का ही नतीजा था कि बिहार 1912 में बंगाल से पृथक प्रान्त के रूप में अस्तित्व में आया। सिन्हा साहब ही थे जिन्होंने इस तथ्य को समझा था कि बिहार जैसे पिछड़े इलाके दोहरा औपनिवेशिक संकट झेल रहे हैं। बिहार दो उपनिवेशवाद के जकडन में जकड़ा था।

पहला ब्रिटिश तो दुसरा बंगाल। ब्रिटिश उपनिवेशवाद तो ऊपर -ऊपर था, लेकिन यह बंगला उपनिवेशवाद प्रत्यक्ष सीने पर सवार था। हर शहर का नागरिक जीवन बंगालियों की गिरफ्त में था। हर जगह डाक्टर ,वकील, प्रोफ़ेसर बंगाली ही होते थे। वे बिहारियों से भरपूर नफरत भी करते थे। रेलवे के विस्तार के साथ बंगालियों का भी अखिल भारतीय विस्तार हो गया।

बिहार को बंगालियों के चंगुल से मुक्त

कहा जाता है कि सिन्हा साहब जब लंदन से पढाई कर गांव लौटे और बक्सर रेलवे स्टेशन पर एक रेलवे कांस्टेबल को बंगाल पुलिस का बिल्ला लगाए देखा, तब उनका मन दुःख से भर गया था। उन्होंने लंदन प्रवास में ही ठान लिया था कि बिहार को बंगालियों के चंगुल से मुक्त कराना है। जब वह बिहार लौटें तो अपने काम में लग गए और महेश नारायण जैसे कुछ मित्रों के साथ बिहार को बंगालियों से मुक्त करने का झंडा उठा लिया।

उस वक्त बिहारियों का जीवन बहुत सुस्त और लुंज पुंज था। जात कुजात के चक्कर में रहा करते थें. समाज को जागृत करने में जहां जिसकी भूमिका होनी चाहिए कुछ नही था। बस खाना कमाना। पटना से उस समय न कोई अखबार न थियेटर और क्लब या सामाजिक विमर्श की कोई परंपरा भी नही थी। साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी बिहारियों का पढ़ा-लिखा कायस्थ और मुस्लिम समाज बंगालियों का चापलूस चमचा बना हुआ था।

चारों ओर खामोशी मायूसी अन्धेरा

सिन्हा साहब के शब्दों में ‘ चारों ओर खामोशी मायूसी अन्धेरा था’। उन्होंने इस कमजोर कड़ी की को पहचाना। उन्होंने 1894 में  बिहार टाइम्स अख़बार का प्रकाशन शुरू किया। बंगालियों ने इसे बिहारियों का प्रलाप कहा। सच्चिदानंद सिन्हा टिके रहें। आगे चल कर उन्होंने इलाहबाद से निकलने वाले कायस्थ समाचार पत्रिका को ही खरीद लिया और उसे हिंदुस्तान रिव्यू नाम दिया।

साल 1907 में अपने मित्र और सहयोगी महेश नारायण के देहांत के बाद वह अकेले हो गए, लेकिन 1911 में अपने साथी सर अली इमाम से मिल कर इन्होने केंद्रीय विधान परिषद् में बिहार का मामला रखने के लिए उत्साहित किया। अली साहब ने सम्राट की घोषणा में बिहार के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर इन कौंसिल की घोषणा कर दी। जैसे ही सम्राट की घोषणा हुई, सिन्हा खुशी और उल्लास से भर गए।

अपने मित्र से छल

दरअसल सिन्हा जी अपने मित्र से छल किया था। अली इमाम साहब से सिन्हा ने जिद की उसे कौंसिल के साथ करवाइये और अली इमाम साहब मान गए और अंग्रेज हुक्मरानों, जिनके चमचे बेलचे बंगाली भी थे, इस बारीकी पर ध्यान नहीं दे पाए। जैसे ही घोषणा हुई सिन्हा साहब ने अपनी ख़ुशी को प्रदर्शित किया। इमाम को बिहार के निर्माण की बधाई दी। इमाम साहब ने कहा – ‘  मूर्खता की बातें कर रहे हो।

बिहार कैसे बन गया? ‘  सिन्हा साहब ने स्पष्ट किया यदि कौंसिल बनेगा तो अलग प्रान्त बनाना  ही होगा। उनकी वकील बुद्धि पर इमाम साहब हैरान हो गए। नाराजगी  प्रदर्शित करते हुए कहा इमाम साहब ने कहा- सिन्हा, तुमने मेरे साथ छल-कपट किया है। अंग्रेज लोगों ने आंख बंद कर मुझ पर विश्वास किया और मैंने ही उन्हें धोखा दे दिया। सिन्हा साहब ने कहा, मैंने जो भी किया अपने बिहार के गौरव लिए किया।

नवजागरण विकसित करने में योगदान

सिन्हा साहब ने बिहार के निर्माण और सामाजिक नवजागरण विकसित करने में जो योगदान किया है उसे नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए,  उस पर व्यवस्थित काम होना ही चाहिए।  9 दिसम्बर 1946 को जब संविधान सभा की पहली बैठक हुई तो सबसे उम्रदराज सदस्य के नाते सिन्हा साहब को ही इसका अस्थायी सभापति बनाया गया।

जब संविधान बन गया, तब उनके हस्ताक्षर के लिए राजेंद्र बाबू के नेतृत्व में एक दल पटना आया, क्योंकि सिन्हा साहब दिल्ली जाने में अस्वस्थता के कारण अक्षम थे। कहते हैं राष्ट्रगान पर उनका बिहारीपन एक बार उस वक्त फिर मचल उठा जब उन्होंने एतराज किया कि -‘ इस गान में हमारा बिहार तो है ही नहीं।’  सिन्हा साहब हिंदी समर्थक भी नहीं थे।

वह बिहारी बोलियों को भाषा का दर्जा देना चाहते थे। वह कभी हिंदी नहीं बोलते थे। भोजपुरी उनकी जुबान थी और इस पर उन्हें जरूरत से कुछ ज्यादा गुमान था। अंग्रेजी से फुर्सत मिलने पर वह भोजपुरी ही बोलते थे। भिखारी ठाकुर को पहली दफा नागरिक सम्मान उन्होंने दिया। उनके सम्मान में एक भोज दिया जिसमें पटना के गणमान्य लोग उपस्थित थे।

सिन्हा लाइब्रेरी आख़िरी सांसें ले रहा

1924 में पचास हजार रुपए देकर उन्होंने एक लाइब्रेरी स्थापित की जो आज भी सिन्हा लाइब्रेरी के नाम से आख़िरी सांसें ले रहा है। उसी के साथ राधिका सिन्हा इंस्टिट्यूट है। राधिका सिन्हा उनकी पत्नी थीं। 1936 से 1944 तक वह पटना विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। उस समय संभवतः वह बिहार का एकमात्र विश्वविद्यालय था। इस विश्वविद्यालय को ऊंचाइयां देने के लिए उन्होंने सब कुछ किया।

उनका कार्यकाल स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। इन व्यस्तताओं से समय निकाल कर वह लिख-पढ़ भी लेते थे। कहते हैं वह खूब पढ़ते थे। पढ़ते वक़्त किताब की पसंदीदा पंक्तियों पर लाल-नीली रेखाएं खींचना भूलते नहीं थे। सिन्हा लाइब्रेरी की शायद ही कोई पुस्तक हो जो उनके रेखांकन से बची हुई हो। उन्होंने अपने वक़्त के लोगों पर खूबसूरत संस्मरणात्मक लेख लिखे हैं। कवि इक़बाल पर भी उनकी एक किताब है- ‘ इक़बाल: द पोएट एंड हिज मैसेज’।

सिन्हा साहब ही थें जिन्होंने जाति से जमात की ओर और प्रदेश से देश की ओर का नारा बुलंद किया था। वह कायस्थों की जाति सभा के अध्यक्ष रहे, लेकिन जाति की कट्टरता को तोड़ते हुए विधवा से विवाह किया था और इसके लिए उन्हें जाति बहिष्कृत कर दिया गया। इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं थी।

डॉक्टर राजेंद्र बाबू ने आत्मकथा में लिखा

राजेंद्र बाबू ने आत्मकथा में लिखा है कि किस तरह मैट्रिक पास करने के बाद सिन्हा साहब का आशीर्वाद लेने के लिए वह पटना आना चाहते थे, लेकिन इस भय से कि उन्हें भी जाति बहिष्कृत कर दिया जाएगा डर गए थे। आखिरकार बहुत छुपते हुए वह सिन्हा साहब से मिले और चरणस्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया। सिन्हा साहब जब इलाहाबाद में वकालत कर रहे थे, तब मोतीलाल नेहरू के अभिन्न मित्र थें। दोनों कांग्रेस में साथ-साथ सक्रिय हुए।

इसे भी पढ़ें : सीएम नीतीश सरकार का ऑर्गनाईज्ड क्रा!ई!म

हालांकि 1920  के बाद सिन्हा साहब दलगत राजनीति से अलग हो गए। इलाहाबाद में मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर इन्होने सत्यसभा की स्थापना में योगदान दिया। यह सत्यसभा ब्रह्मसमाज की तरह का एक सामाजिक मंच था। जिसपर अब तक कोई शोधकार्य नहीं हुआ है।

अपना ही देशवासी यह नहीं जानता कि इस देश में एक बिहार भी रहता है। वही बिहार, जहां दुनिया में पहली बार गणतांत्रिक शासन शुरू हुआ था। वही बिहार, जहां कभी राष्ट्र की राजधानी थी, जहां चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक महान हुए।  जहां सनातन धर्म के अधिकतर शास्त्र रचे गए, जहां जैन और बौद्ध धर्म-धारा अवतरित हुई।

नालंदा विश्वविद्यालय और चाणक्य की कर्मभूमि

जब अकबर के समय आधे बिहार को अवध के हिस्से में और आधे को बंगाल की झोली में डाल दिया गया था, तभी अन्याय हुआ था। अंग्रेजों ने भी समझ लिया था कि बिहार को अलग से पहचान देना खतरे से खाली नहीं है। नालंदा विश्वविद्यालय और चाणक्य की कर्मभूमि को लोग न जानें, तो ही बेहतर है। बिहारियों को अलग से पहचानने की जरूरत ही क्या है?

आधुनिक बिहार के निर्माता प्रकांड विद्वान सच्चिदानंद सिन्हा (1871-1950) भारतीय संविधान सभा के पहले अध्यक्ष भी बनाए गए थे। बिहार के नवजागरण में उनका उतना ही योगदान है, जितना बंगाल के नवजागरण में राजा राममोहन राय का है।

लोग बताते हैं जब वे कानून की पढ़ाई कर इंग्लैंड से पटना लौटे तो यहां वे जिस सड़क से गुजरते थे लोग उसे पानी से धोते थे। समुंद्र लांघकर इंग्लैंड जाने के कारण लोग उन्हें अछूत मानते थे। विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले वे शायद पहले बिहारी थे। जिस वक्त विधवा विवाह वर्जित था उस वक्त विधवा विवाह कर सामाजिक जकड़नों को तोड़ने का उदाहरण पेश किया।

आज हम उन्हें अपने चंद राजीनति फायदे के लिए भूल रहे हैं। उनकी स्मृति शेष को बचाने की बात तो दूर अपनी-अपनी रोटी सेंकने के चक्कर में हर दिन रसातल में जाते जा रहे हैं। जब सरकार बाहरी हो जाए, गूंगी हो जाए तो जिम्मेवारी कौन तय करे? समाज को बांटना वोट के लिए हर छल प्रपंच अपनाना हम बिहारियों को अभिशप्त रहना होगा। मन व्यथित है की बिहार के नवनिर्माण में जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन गंवा दिया आज उपेक्षा का शिकार हो गया या यह कहें कि राजनीति उदंडता के चक्कर में धुल धूसरित होता जा रहा है।

Related posts

राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण के लिए तोड़ी गई 300 साल पुरानी मस्जिद

Samdarshi Priyam

Gujarat Election 2022: बीजेपी ने उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट जारी की

Samdarshi Priyam

सोशल मीडिया से हो सकती है भारतीय चुनावों में धांधली: राहुल गांधी

Samdarshi Priyam

Leave a Comment